गुरुवार 13 अगस्त 2026 - 10:09
रसूल-ए-अकरम की आलम-ए-बक़ा की ओर रिहलत पूरी इंसानियत और कायनात के लिए एक बड़ा सदमा थी: आगा हसन मूसवी

अंजुमन-ए-शरई शियान-ए-जम्मू-कश्मीर के तहत पूरी घाटी में यौम-ए-विसाल रसूल-ए-अकरम और यौम-ए-शहादत इमाम हसन मुज्तबा के सिलसिले में मजालिस-ए-अज़ा का आयोजन किया गया। इस सिलसिले में केंद्रीय इमामबाड़ा बडगाम और पुराने इमामबाड़ा हसनाबाद में केंद्रीय मजालिस-ए-अज़ा आयोजित हुईं।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा के विसाल और करीम-ए-अहले-बैत हज़रत इमाम हसन मुज्तबा की शहादत के अवसर पर जम्मू-कश्मीर अंजुमन-ए-शरई शियान के तत्वावधान में हर वर्ष की तरह घाटी के विभिन्न क्षेत्रों में मजालिस-ए-अज़ा और विशेष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए।

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केंद्रीय स्तर की मजालिस केंद्रीय इमामबाड़ा बडगाम और पुराने इमामबाड़ा हसनाबाद, श्रीनगर में आयोजित हुईं। इसके अलावा याल कंजर, बोना मोहल्ला नौगाम, गामदू, उड़ीना सोनावारी, वानाहामा बीरवाह सहित अन्य क्षेत्रों में भी मजालिस-ए-अज़ा का आयोजन किया गया, जिनमें बड़ी संख्या में अज़ादारों और श्रद्धालुओं ने भाग लिया।

पुराने इमामबाड़ा हसनाबाद, श्रीनगर में सभा को संबोधित करते हुए अंजुमन-ए-शरई शियान के अध्यक्ष हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन आगा सैयद हसन अल-मूसवी अस्फ़वी ने रसूल-ए-अकरम के विसाल से संबंधित ऐतिहासिक घटनाओं और इस त्रासदी के उम्मत-ए-मुस्लिमा पर पड़ने वाले प्रभावों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

रसूल-ए-अकरम की आलम-ए-बक़ा की ओर रिहलत पूरी इंसानियत और कायनात के लिए एक बड़ा सदमा थी: आगा हसन मूसवी

उन्होंने कहा कि रसूल-ए-अकरम का आलम-ए-बक़ा की ओर प्रस्थान पूरी इंसानियत और कायनात के लिए एक बहुत बड़ा सदमा था। उनकी याद में आज भी रोना और मातम करना रसूल-ए-अकरम से प्रेम और दिली लगाव का इज़हार है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि रसूल-ए-अकरम की वफ़ात पर शोक और रोने का हरगिज़ यह अर्थ नहीं है कि नबी की हयात के عق़ीदे से इनकार किया जाए, बल्कि यह उम्मत की गहरी मोहब्बत और दिली लगाव की निशानी है।

आगा सैयद हसन ने हज़रत इमाम हसन मुज्तबा की मुबारक ज़िंदगी और उनके चरित्र के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इमाम हसन मुज्तबा ने दीन और उम्मत की रक्षा तथा मुस्लिम उम्मत को एक विनाशकारी आंतरिक संघर्ष से बचाने के लिए अपने ज़ाहिरी पद की कुर्बानी दी।

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उन्होंने कहा कि उस दौर में मुसलमान आपसी मतभेदों का शिकार हो चुके थे और एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए थे। ऐसे नाज़ुक हालात में इमाम हसन का निर्णय उम्मत के व्यापक हित, दीन की रक्षा और इस्लामी एकता के संरक्षण पर आधारित था।

उन्होंने कहा कि इमाम हसन मुज्तबा की मुबारक ज़िंदगी के विभिन्न और अत्यंत कठिन चरण इस सच्चाई को दर्शाते हैं कि इमाम ने हर दौर में परिस्थितियों की आवश्यकता के अनुसार इस्लामी दृष्टिकोण अपनाया और कड़े विरोध तथा कठिनाइयों के बावजूद अपने सिद्धांतवादी रुख से कभी विचलित नहीं हुए।

आगा सैयद हसन ने कहा कि इमाम हसन की सुलह केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं है, बल्कि क़यामत तक मुसलमानों के बीच एकता, भाईचारे, दूरदर्शिता और दीन की रक्षा के लिए एक उज्ज्वल मार्गदर्शक सिद्धांत की हैसियत रखती है।

रसूल-ए-अकरम की आलम-ए-बक़ा की ओर रिहलत पूरी इंसानियत और कायनात के लिए एक बड़ा सदमा थी: आगा हसन मूसवी

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